बदलते समीकरण, बदलता युद्ध और बदलते अमेरिका के प्रति दुनिया का रवैया
21वीं सदी का नया भू-राजनीतिक मोड़
आज वैश्विक वातावरण धीरे-धीरे तीसरे विश्व युद्ध की तरफ जा रहा है। ऐसा हमें आज के समय की कई बातें बता रही हैं। मुख्य युद्ध हर तरफ फैलता दिख रहा है, जैसे—
Russia – Ukraine
America – Iran
Saudi – Yemen
Pakistan – Afghanistan
और तेजी से नए फ्रंट युद्ध के रूप लेते जा रहे हैं। 21वीं सदी में इन युद्धों का कारण शक्ति प्रदर्शन करना है। जैसे— अमेरिका दुनिया पर राज करना चाहता है तथा ईरान का प्रभाव मध्य एशिया में समाप्त करना चाहता है।
पहले आतंकवाद एक युद्ध व्यवस्था के तौर पर देखा जाता था, पर अब कई युद्ध हो रहे हैं। युद्ध कभी भी अकेले नहीं होते। उदाहरण के लिए ईरान ने मिसाइल के माध्यम से हमला किया, जो कि अमेरिका के देशों पर हुआ। इस दौर में युद्ध आग की तरह फैल सकता है।
क्या एकध्रुवीय (Unipolar) दुनिया का अंत हो रहा है?
पिछले 20 वर्षों की बात करें तो एक देश काफी शक्तिशाली उभर कर आया है, वह है चीन।
चीन अब हर क्षेत्र में अमेरिका को टक्कर दे रहा है। हो सकता है कि आने वाले समय में वह नंबर-1 भी बन जाए। दूसरी बात यह भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया में अब कोई एकतरफा शक्तिशाली देश नहीं रह गया है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अगर अमेरिका शक्तिशाली होता, तो आज की दिनांक तक ईरान-अमेरिका के युद्ध को 6 महीने होने के बावजूद ईरान झुका नहीं है और अमेरिका के सिरदर्द की स्थिति बनी हुई है।
यही नहीं, यदि आज शक्तिशाली देशों की बात आएगी तो उसमें अमेरिका, चीन, रूस, भारत, जर्मनी, फ्रांस, जापान आदि के नाम बताए जाएंगे। इससे यह बात साफ हो जाती है कि…इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि अब दुनिया में किसी एक देश का एकाधिकार या दबदबा नहीं रहा है। अमेरिका अब पूरी दुनिया का अकेला निर्णायक या "विश्व का सरपंच" नहीं रहा। आज वैश्विक शक्ति का संतुलन बदल चुका है और कई देश समानांतर रूप से उभरकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यानी दुनिया अब धीरे-धीरे एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
चीन और रूस का नया धड़ा (Axis) और पश्चिमी प्रभाव को चुनौती
अब बात करें चीन और रूस की, तो दोनों देशों ने आपसी सामंजस्य और रणनीतिक सहयोग को इस स्तर तक मजबूत किया है कि आज वैश्विक राजनीति में उनकी भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है। यूरोप, अफ्रीका और पश्चिमी एशिया सहित कई क्षेत्र अपने हितों के अनुसार चीन और रूस के साथ संबंधों को महत्व दे रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब पहले जैसी एकध्रुवीय नहीं रही और अमेरिका का प्रभाव कई क्षेत्रों में पहले की तुलना में सीमित हुआ है।
Hormuz Strait इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
यूरोप और अमेरिका की दूरी: क्या हो रहा है?
हालाँकि अमेरिका अभी भी कई देशों, विशेषकर कुछ खाड़ी (गल्फ) देशों के साथ अपने रणनीतिक और सुरक्षा संबंध बनाए हुए है, लेकिन हाल के वर्षों में क्षेत्रीय संघर्षों और बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण कई देश अपनी सुरक्षा और विदेश नीति में केवल एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय बहुध्रुवीय संतुलन की ओर बढ़ रहे हैं। इसी कारण वे अमेरिका के साथ-साथ चीन, रूस और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ भी अपने संबंध मजबूत करने की नीति अपना रहे हैं।
ड्रोन, एआई (AI) और साइबर अटैक: युद्ध की नई तकनीकें
पिछले कुछ वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल के अमेरिका-ईरान सैन्य टकरावों ने दुनिया को यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब केवल बड़ी सेना, अत्याधुनिक लड़ाकू विमान या विशाल सैन्य बजट ही जीत की गारंटी नहीं हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन तकनीक और सटीक मिसाइल प्रणालियां युद्ध के मैदान में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं।
यूक्रेन इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद AI-सक्षम ड्रोन, निगरानी तकनीक और कम लागत वाले हमलावर ड्रोन का प्रभावी उपयोग करके रूस जैसी बड़ी सैन्य शक्ति को लगातार चुनौती दी। वहीं अमेरिका और ईरान के बीच हाल के सैन्य टकरावों ने भी यह दिखाया कि ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां किसी भी संघर्ष की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि कोई भी छोटा देश केवल AI और ड्रोन के दम पर किसी भी महाशक्ति को निश्चित रूप से झुका सकता है। युद्ध का परिणाम अभी भी सैन्य क्षमता, आर्थिक संसाधन, खुफिया जानकारी, वायु रक्षा, साइबर शक्ति, कूटनीतिक समर्थन और राजनीतिक इच्छाशक्ति जैसे कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि AI और ड्रोन तकनीक ने आधुनिक युद्ध का पैटर्न बदल दिया है। आज कम लागत वाली उन्नत तकनीकें छोटे देशों को भी अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने और बड़ी शक्तियों के सामने प्रभावी प्रतिरोध खड़ा करने का अवसर दे रही हैं। यही कारण है कि भविष्य के युद्धों में AI, स्वायत्त ड्रोन और स्मार्ट हथियार पारंपरिक सैन्य ताकत जितने ही महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
'ग्लोबल पुलिसमैन' से पीछे हटता अमेरिका
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में अमेरिका को विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में गिना जाता था। विशेषकर शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर उसका गहरा प्रभाव रहा। उसकी नीतियों का असर दुनिया के कई देशों की विदेश नीति और वैश्विक बाजारों पर भी दिखाई देता था।
हालांकि इक्कीसवीं सदी में वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। चीन के आर्थिक और सामरिक उदय, रूस की सक्रिय विदेश नीति, ब्रिक्स जैसे समूहों के विस्तार तथा कई क्षेत्रीय शक्तियों के उभरने से दुनिया पहले की तुलना में अधिक बहुध्रुवीय (Multipolar) होती जा रही है। ऐसे में अमेरिका का प्रभाव पहले जैसा निर्विवाद नहीं रह गया है। कई देश अब अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं और हर मुद्दे पर अमेरिका के साथ खड़े नहीं होते।
दूसरी ओर, कुछ देश चीन के निवेश और ऋण परियोजनाओं से जुड़े हुए हैं। इन परियोजनाओं को लेकर कई बार "डेब्ट ट्रैप" (ऋण-जाल) जैसी आलोचनाएं भी होती हैं, लेकिन अलग-अलग देशों के अनुभव और परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए यह कहना कि सभी देश केवल इसी कारण अमेरिका से दूरी बना रहे हैं, एक सामान्यीकरण होगा।
यदि पश्चिम एशिया (गल्फ क्षेत्र) में चल रहे संघर्ष लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो वहां भी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और अमेरिका का प्रभाव प्रभावित हो सकता है। हालांकि भविष्य में क्या होगा, यह कई राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक कारकों पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि आज दुनिया पहले की तुलना में अधिक बहुध्रुवीय होती जा रही है। अमेरिका अब भी विश्व की सबसे शक्तिशाली सैन्य और आर्थिक शक्तियों में से एक है, लेकिन उसका वैश्विक प्रभाव पहले जैसा एकतरफा नहीं रहा। इसलिए आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कई बड़ी शक्तियां समानांतर रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
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अमेरिकी सहयोगियों (यूरोप, जापान) के मन में बढ़ता अविश्वास
पिछले कुछ वर्षों में यह देखने को मिल रहा है कि अमेरिका और उसके कुछ पारंपरिक सहयोगियों के बीच विश्वास का स्तर पहले जैसा नहीं रहा है। विशेषकर यूरोप और जापान जैसे देशों में यह चिंता बढ़ी है कि अमेरिका की विदेश नीति पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित होती जा रही है। उदाहरण के लिए, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए बयानों ने यूरोप में कई देशों को असहज किया। डेनमार्क ने स्पष्ट रूप से कहा कि ग्रीनलैंड उसकी स्वायत्त इकाई है और वह उसे अमेरिका को देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
इसी प्रकार, जब अमेरिका के नेतृत्व की ओर से समय-समय पर नाटो के भविष्य पर सवाल उठाए जाते हैं या गठबंधन के प्रति कठोर टिप्पणियां की जाती हैं, तो सहयोगी देशों में स्वाभाविक रूप से चिंता और अनिश्चितता पैदा होती है। परिणामस्वरूप, यूरोपीय देशों और अन्य सहयोगियों के बीच यह चर्चा तेज हुई है कि उन्हें अपनी सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में पहले से अधिक आत्मनिर्भर बनने की आवश्यकता है। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन मतभेदों के बावजूद अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग आज भी जारी है।
इस नए दौर में भारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ
भारत की विदेश नीति हमेशा से स्पष्ट और संतुलित रही है। भारत न तो किसी एक देश का पूर्ण समर्थक बनता है और न ही किसी का स्थायी विरोधी। वह अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सभी प्रमुख देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने का प्रयास करता है। इसी नीति के तहत भारत अमेरिका और रूस, दोनों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाता है। रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक और सामरिक संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं, जबकि अमेरिका के साथ भी व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ा है।
भारत की नीति का उद्देश्य किसी एक शक्ति पर निर्भर होना नहीं, बल्कि सभी देशों के साथ संतुलित और व्यावहारिक संबंध बनाए रखना है। भारतीय विदेश नीति की आधारशिला "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना है, जिसका अर्थ है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। इसी सोच के अनुरूप भारत वैश्विक शांति, सहयोग और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।
आने वाले समय में भी भारत का लक्ष्य यही रहेगा कि वह विश्व मंच पर अपनी स्वतंत्र और प्रभावशाली पहचान को और मजबूत करे, विभिन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ाए तथा किसी एक राष्ट्र पर अत्यधिक निर्भर हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखे।












