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जलवायु परिवर्तन और Geopolitics का संबंध क्या है-

जलवायु परिवर्तन और Geopolitics का संबंध क्या है-

जलवायु परिवर्तन और Geopolitics का संबंध क्या है


परिचय:-

कल्पना कीजिए कि किसी देश में पानी खत्म होने लगे, खेती बर्बाद हो जाए और लाखों लोग पलायन करने पर मजबूर हो जाएं। ऐसी स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का भी मुद्दा बन जाती है। यही कारण है कि आज जलवायु परिवर्तन को दुनिया की सबसे बड़ी Geopolitical चुनौतियों में गिना जाता है।

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। बारिश के बदलते चक्र, बढ़ते समुद्री जलस्तर और पीने के पानी की किल्लत के कारण अब यह मुद्दा वैश्विक राजनीति के केंद्र में भी आ गया है।

इसके अलावा, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएँ दिन-ब-दिन और हर दशक (10 साल) में गंभीर रूप लेती जा रही हैं।

जलवायु परिवर्तन और Geopolitics का क्या संबंध है?


आइए अब समझते हैं कि जलवायु परिवर्तन क्या है

 इसका सीधा अर्थ मौसम के प्राकृतिक चक्र में बदलाव से है। हमारे यहाँ हर मौसम का एक निश्चित चक्र होता है, जैसे समय पर बारिश या सर्दी का आना। लेकिन अब यह संतुलन बिगड़ चुका है। कहीं अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं सूखे के हालात हैं; कई क्षेत्रों में रिकॉर्ड तोड़ सर्दी पड़ रही है तो कहीं भीषण गर्मी। मौसम का यही अप्रत्याशित (unpredictable) बदलाव ही जलवायु परिवर्तन है।

Geopolitics क्या है-

Geopolitics वह अध्ययन है जिसमें भौगोलिक स्थिति, संसाधन और राजनीतिक शक्ति के आधार पर देशों के बीच संबंधों का विश्लेषण किया जाता है।

जलवायु परिवर्तन और Geopolitics का संबंध-

आइए इस पूरे विषय को कुछ मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझते हैं: 

1. प्राकृतिक संसाधनों की कमी और भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension): 

प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और उनकी कमी के कारण देशों के आपसी संबंधों में कड़वाहट आ रही है। इसका सबसे सटीक उदाहरण भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल बंटवारा है। जलवायु परिवर्तन के चलते पीने योग्य पानी और कृषि योग्य भूमि लगातार कम हो रही है, जिससे देशों के बीच संसाधनों को लेकर विवाद और गहरा गया है।

2. आर्कटिक क्षेत्र का पिघलना और नया शीत युद्ध (Cold War): ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ तेज़ी से पिघल रही है, जिससे नए वैश्विक समुद्री व्यापार मार्ग (Maritime Routes) खुल रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका, रूस, चीन और कनाडा जैसी महाशक्तियों के बीच इस क्षेत्र के रणनीतिक नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों (खनिजों) के दोहन को लेकर एक तीव्र होड़ शुरू हो गई है। संसाधनों पर कब्ज़े की यह राजनीति वैश्विक सुरक्षा के लिए एक नया संकट पैदा कर रही है, जिससे सैन्य टकराव की आशंका भी बढ़ गई है।

3. जलवायु शरणार्थी (Climate Refugees) और संसाधनों पर दबाव:

यह तीसरा बिंदु अत्यंत विचारणीय है। बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण निचले तटीय क्षेत्रों से लाखों लोग विस्थापित हो रहे हैं। जलमग्न होते इलाकों को छोड़कर जब ये लोग पड़ोसी देशों में शरण लेते हैं, तो वहाँ एक नया 'जलवायु शरणार्थी संकट' पैदा हो जाता है। सीमित संसाधनों वाले मेजबान देशों के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उनके लिए अपनी ही आबादी की बुनियादी ज़रूरतें (भोजन, पानी, रोज़गार) पूरी करना मुश्किल हो जाता है, जिससे आपसी तनाव बढ़ता है।



जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति (Geopolitics) का संबंध:


आज के दौर में जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) का एक नया और बेहद जटिल केंद्र बिंदु बन चुका है, जिसके केंद्र में भारत जैसे तेजी से उभरते देश खड़े हैं। भू-राजनीतिक नजरिए से देखें तो जलवायु परिवर्तन संसाधनों की कमी को बढ़ाकर वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव को जन्म दे रहा है, जिससे भारत के सामने गंभीर सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। उदाहरण के लिए, हिमालय के ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और मानसून का अनिश्चित होना सीधे तौर पर दक्षिण एशिया में जल सुरक्षा को खतरे में डालता है, जो भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच पहले से ही संवेदनशील जल-राजनय (Water Diplomacy) और सीमा विवादों को और अधिक भड़का सकता है। इसके अतिरिक्त, समुद्र का जलस्तर बढ़ने से पड़ोसी देश बांग्लादेश और मालदीव जैसे निचले तटीय क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर "जलवायु शरणार्थियों" (Climate Refugees) का पलायन भारत की तरफ हो सकता है, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा, जनसांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता पर भारी दबाव डालेगा। वैश्विक मंचों पर भी, विकसित देशों द्वारा अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव बनाया जाता है, जबकि वे खुद ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी लेने और वित्तीय व तकनीकी सहायता (Climate Finance) देने में आनाकानी करते हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक नया टकराव (North-South Divide) पैदा होता है।


हालांकि, इस गंभीर संकट के बीच भारत के लिए वैश्विक नेतृत्वकर्ता और आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने के अभूतपूर्व अवसर भी छिपे हैं। भारत ने अपनी भू-राजनीतिक स्थिति का समझदारी से उपयोग करते हुए 'इंटरनेशनल सोलर एलायंस' (ISA) और 'कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर' (CDRI) जैसे वैश्विक संगठनों की शुरुआत की है, जिसने भारत को "ग्लोबल साउथ" (विकासशील देशों) की मुखर आवाज और ग्रीन एनर्जी के अगुआ के रूप में स्थापित कर दिया है। हरित परिवर्तन (Green Transition) का यह दौर भारत के लिए सिर्फ पर्यावरण बचाने का जरिया नहीं है, बल्कि अपनी भारी ईंधन निर्भरता (कच्चे तेल के आयात) को कम करके "ऊर्जा आत्मनिर्भरता" हासिल करने और अपनी भू-राजनीतिक संप्रभुता को मजबूत करने का एक सुनहरा मौका है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और विशेष रूप से ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करके भारत न केवल अपनी विशाल घरेलू मांग को पूरा कर सकता है, बल्कि भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों और उपकरणों का एक प्रमुख वैश्विक विनिर्माण और निर्यात केंद्र (Manufacturing Hub) भी बन सकता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और उन्नत बैटरियों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को सुरक्षित करने के लिए भारत 'क्वाड' (QUAD) और अन्य रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से चीन के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। संक्षेप में कहें तो, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति का यह परस्पर संबंध भारत को एक तरफ जहां अपनी सीमाओं, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रक्षा करने की कड़ी चुनौती देता है, वहीं दूसरी तरफ इसे एक जिम्मेदार वैश्विक महाशक्ति, पर्यावरण-तकनीकी के प्रर्वतक और एक नई, न्यायसंगत हरित विश्व व्यवस्था के निर्माता के रूप में स्थापित होने का ऐतिहासिक मंच भी प्रदान करता है।



जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति (Geopolitics): भारत के लिए चुनौतियां और अवसर

चुनौतियां (मुसीबतें):

सबसे बड़ा खतरा हमारे पड़ोस और सीमाओं से है। जब गर्मी बढ़ेगी और हिमालय के ग्लेशियर पिघलेंगे, तो भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी को लेकर झगड़ा बढ़ सकता है। इसके अलावा, समुद्र का जलस्तर बढ़ने से अगर बांग्लादेश या मालदीव जैसे पड़ोसी देशों में बाढ़ आती है या वो डूबते हैं, तो वहां के लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आने की कोशिश करेंगे, जिससे हमारी सुरक्षा और संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा। साथ ही, अमेरिका और यूरोप जैसे अमीर देश खुद तो प्रदूषण फैलाकर अमीर बन गए, लेकिन अब वो भारत जैसे विकासशील देशों पर दबाव डालते हैं कि हम अपनी फैक्टरियां और कोयले का इस्तेमाल बंद करें। यह भारत के विकास को रोकने की एक अंतरराष्ट्रीय चाल जैसी बन जाती है।


अवसर (फायदे):

लेकिन इस संकट को भारत एक मौके में बदल रहा है। आज भारत दुनिया को दिखा रहा है कि पर्यावरण को कैसे बचाया जाए। भारत ने 'इंटरनेशनल सोलर एलायंस' (ISA) बनाकर पूरी दुनिया के सामने खुद को सौर ऊर्जा (Solar Energy) के लीडर के रूप में पेश किया है। इससे दुनिया में भारत की इज्जत और ताकत दोनों बढ़ी है। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि भारत अभी अरब देशों से बहुत महंगा कच्चा तेल खरीदता है। अगर हम तेजी से सोलर पावर, विंड पावर और ग्रीन हाइड्रोजन अपना लें, तो हमारी विदेशों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी और अरबों रुपये बचेंगे। भारत के पास मौका है कि वह इलेक्ट्रिक गाड़ियों और सोलर पैनल बनाने का दुनिया का सबसे बड़ा हब बन जाए और लाखों युवाओं को नौकरियां दे।


 परिवर्तन भारत के लिए एक ऐसी परीक्षा है, जिसमें अगर हम अपनी सीमाओं और पानी को बचा ले गए, तो हम दुनिया के सबसे बड़े 'ग्रीन सुपरपावर' बनकर उभरेंगे।


जलवायु परिवर्तन (Climate Change) प्रश्नोत्तरी

मैंने जलवायु परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं जैसे ग्रीनहाउस गैसें, अंतरराष्ट्रीय नीतियां और वैज्ञानिक प्रभावों को कवर करते हुए यह क्विज़ तैयार किया है। अपनी तैयारी को परखने के लिए इसे हल करें और अपने ज्ञान को बढ़ाएं। शुभकामनाएँ!


Q1. निम्नलिखित में से कौन सी गैस 'ग्रीनहाउस प्रभाव' (Greenhouse Effect) के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है?


सही उत्तर:  कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)



Q2. ऐतिहासिक 'पेरिस जलवायु समझौता' (Paris Climate Agreement) किस वर्ष लागू/हस्ताक्षरित हुआ था?

सही उत्तर: (C) 2015

Q3. भारत ने किस वर्ष तक 'नेट-जीरो' (Net-Zero Emissions) यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है?

सही उत्तर: (D) 2070


Q4. जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था IPCC का पूर्ण रूप (Full Form) क्या है?

सही उत्तर: (B) Intergovernmental Panel on Climate Change


Q5. जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ने का मुख्य वैज्ञानिक कारण क्या है?

सही उत्तर: (C) ग्लेशियरों का पिघलना और पानी का तापीय प्रसार (Thermal Expansion)


नोट (वेबसाइट रीडर्स के लिए): गर्मी के कारण सिर्फ बर्फ ही नहीं पिघलती, बल्कि गर्म होने पर समुद्र का पानी भी फैलता है (थर्मल एक्सपेंशन), जिससे जलस्तर तेजी से बढ़ता है।


टिप (वेबसाइट के लिए): आप अपनी वेबसाइट पर सही उत्तर और नोट को 'Spoiler Alert' या 'Show Answer' बटन के अंदर छिपा सकते हैं ताकि यूजर पहले खुद कोशिश करे।



भारत के लिए चुनौतियां और अवसर  जैसे-जैसे मौसम बदल रहा है और गर्मी बढ़ रही है भारत जैसे एक बड़े देश के लिए यह सिर्फ पर्यावरण का मामला नहीं रह गया है बल्कि दुनिया के सभी देशों के बीच एक प्रतिस्पर्धा का माहौल बन गया है। पानी सीमित है और नदियों के जल बंटवारे को लेकर तनाव का माहौल उत्पन्न होना शुरु हो गया जैसे- भारत व पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी का विषय इसका एक उदाहरण है


अब हम यह देखेंगे की जलवायु परिवर्तन से भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और हमारे लिए आपदा में अवसर किस तरह हो सकता है।


Water War 2030: Kya Bharat-Pakistan

Green Energy Ka Naya Khel- Kya Lithium aur cobalt Banegee future ke Petrol


यूरोप और अमेरिका की दूरी: क्या हो रहा है?

यूरोप और अमेरिका की दूरी: क्या हो रहा है?

 अमेरिका से दूर जा रहा यूरोप: जानिए इसके कारण

दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप एक-दूसरे के करीब आए और नाटो (NATO) जैसे संगठन का निर्माण हुआ। और फिर अमेरिका और यूरोप दोनों ने एक रणनीतिक साझेदारी की जो कि आज तक चल रही है। दोनों ने रक्षा, उद्योग और भी कई क्षेत्रों में एक साथ काम किया.

यह सब सोवियत संघ के कारण हुआ. यूरोप को सोवियत संघ से खतरा था इसलिए अमेरिका उनका विशेष साझेदार बना जो कि आज तक चल रहा है। पर पिछले कुछ सालों में अमेरिका और यूरोप के बीच तनातनी देखने को मिल रही है. यूरोप अब खुद अपने हितों को देखने की कोशिश कर रहा है, वह अपनी निर्भरता अमेरिका से कम करना चाहता है। पर ऐसा क्या हुआ कि यूरोप अब आत्मनिर्भर होना चाहता है.





अमेरिका से दूर जा रहा यूरोप

वैैसे यूरोप के बदलते रुख के पीछे पिछले कुछ वर्षों की घटनाएं हैं, जिनको हम एक-एक करके देखेंगे-

(1) अमेरिका की राजनीतिक अस्थिरता और 'अमेरिका फर्स्ट' नीति- 
जब से डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, उन्होंने 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) की नीति अपनाई और बार-बार नाटो (NATO) को एक पुराना संगठन बताया और यूरोपीय देशों को अपना रक्षा बजट बढ़ाने को कहा. इससे यूरोप को लगा कि ऐसे तो अमेरिका पर हम आंख बंद करके भरोसा नहीं कर सकते हैं.

जब डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार बनी, फिर जो बाइडेन की सरकार बनी और फिर वापस डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार बनी इससे यूरोप को यह आइडिया हो गया कि अमेरिका की विदेश नीति हर 4 साल में बदल जाती है। इससे तो यूरोप की सुरक्षा कैसे होगी.

(2)रूस-यूक्रेन युद्ध-

जब भी अमेरिका को हथियार देने होते थे, तो उसे अपनी संसद से पास कराना होता था। कभी-कभी यूक्रेन की सहायता राशि पर विवाद होता था, इससे यूरोप को यह पता चला कि सुरक्षा के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहना उसके लिए जोखिम का काम हो सकता है.

इस युद्ध में अमेरिका कभी रूस से बात करता, कभी हथियार की सप्लाई यूक्रेन के लिए अटका देता था, जिससे यूरोपीय देशों को समझ में आया कि खुद से मजबूत होना ही सही होगा.

(3) जैसा कि हमने पहले बात की अमेरिका फर्स्ट (America First) नीति के तहत अमेरिका यूरोप पर कभी-कभी टैक्स (टैरिफ) लगा देता है जिससे कि अमेरिका के उद्योगों को फायदा हो। इन सब से यूरोपीय कंपनियों को नुकसान हो रहा है और इसके अलावा भी वह टैरिफ लगाने की धमकी भी देता है.

(4) एक और कारण यह है कि यूरोप चीन को अपना व्यापारिक साझेदार मानता है, जबकि अमेरिका चीन को एक बड़ा दुश्मन मानता है। और साथ में यूरोप तकनीक (Tech) के मामले में अमेरिका पर निर्भर है और अब वह आत्मनिर्भर बनना चाहता है.



डोनाल्ड ट्रम्प और ग्रीनलैंड-

बात 2019 की है, जब अपने पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अचानक मीडिया के सामने यह इच्छा जताई कि अमेरिका डेनमार्क  से ग्रीनलैंड को खरीदना चाहता है.शुरुआत में लोगों को लगा कि यह कोई मज़ाक है लेकिन ट्रम्प इस बात को लेकर बेहद गंभीर थे. उन्होंने अपने सलाहकारों से इसके कानूनी और आर्थिक पहलुओं पर बात करने को भी कह दिया था

इस सब में डेनमार्क की सरकार ने मना कर दिया पर ट्रम्प अपनी जिद पर अड़े हुए थे और इस मुद्दे पर पूरा यूरोप एक हो गया और यूरोप ने यह बात अच्छे से समझ ली कि अमेरिका से दोस्ती और निर्भरता ज्यादा अच्छी नहीं है.

पर क्या यूरोप पूरी तरह से अमेरिका से दूर हो सकता है? तो ऐसा नहीं है अभी समय लगेगा क्योंकि पिछले 80 सालों से वह अमेरिका पर निर्भर था। तो अब सब सही करने में यूरोप को समय लगेगा और अगर अमेरिका और यूरोप दोनों एक साथ हैं, तभी वेस्टर्न कंट्रीज (पश्चिमी देशों) की पावर है यह बात यूरोप और अमेरिका दोनों को पता है। इसलिए इतनी जल्दी यूरोप अमेरिका को नहीं छोड़ेगा.

इन सबका भारत पर असर- 

यूरोप अमेरिका पर निर्भरता कम करना चाहता है और साथ ही साथ चीन पर भी। ऐसे में भारत यूरोप के लिए एक विकल्प बचता है और वह भारत में निवेश को बढ़ाएगा, साथ ही व्यापार और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (Free Trade Agreement) होंगे। भारत के लिए यह एक फायदे का सौदा बन सकता है.

यूरोप की बड़ी-बड़ी कंपनियां अब भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि अपना उत्पादक देश बना रही हैं। जर्मनी की कार कंपनियां, फ्रांस की रक्षा और विमानन कंपनियां  भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं. 

यूरोप का अमेरिका से दूर जाना पूरी तरह अलगाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार संबंधों के पुनर्संतुलन की प्रक्रिया है.

यूरोप अब ऐसी स्थिति में पहुंचना चाहता है जहां वह अपने हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय ले सके. इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका और यूरोप के बीच दशकों पुरानी साझेदारी समाप्त हो जाएगी। बल्कि भविष्य में यह संबंध अधिक संतुलित और बराबरी पर आधारित हो सकते हैं.

आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन का उदय, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा सुरक्षा जैसी चुनौतियां देशों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर रही हैं.

ऐसे समय में यूरोप का अधिक आत्मनिर्भर बनने का प्रयास वैश्विक राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत माना जा सकता है. आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यूरोप वास्तव में रणनीतिक स्वायत्तता हासिल कर पाता है या फिर अमेरिका के साथ उसकी पारंपरिक साझेदारी पहले की तरह मजबूत बनी रहती है.


FAQ Section:
  1. क्या यूरोप अमेरिका से पूरी तरह अलग हो जाएगा-
    नहीं, लेकिन वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
  2. यूरोप अमेरिका पर क्यों निर्भर रहा है-
    मुख्य रूप से सुरक्षा और NATO के कारण.
  3. रणनीतिक स्वायत्तता क्या है-
    ऐसी क्षमता जिसमें यूरोप अपने हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय ले सके.
  4. रूस-यूक्रेन युद्ध का यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ा-
    इससे ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा आत्मनिर्भरता की आवश्यकता बढ़ी.
  5. भारत को इससे क्या लाभ हो सकता है-
    व्यापार, निवेश, रक्षा सहयोग और कूटनीतिक महत्व में वृद्धि हो सकती है.




परिसीमन (Delimitation) बिल क्या है-क्या मानसून सत्र में लोकसभा में भाजपा यह विधेयक पारित कर सकती है-टीएमसी(TMC) के टूटने से भाजपा को फायदा

परिसीमन (Delimitation) बिल क्या है-क्या मानसून सत्र में लोकसभा में भाजपा यह विधेयक पारित कर सकती है-टीएमसी(TMC) के टूटने से भाजपा को फायदा

 परिसीमन (Delimitation) बिल-

 परिसीमन जनसंख्या के हिसाब से किया जाता है। जिसकी जितनी जनसंख्या, उसको उतनी सीट। अब वह लोकसभा हो या विधानसभा। यह सब आखिरी बार 1976 में हुआ था.

उस समय लोकसभा की सीट 543 तय की गई थी और बाद में इसे 2026 तक ऐसे ही रखा गया। लेकिन अब भारत में जनगणना हो रही है और उसी हिसाब से 2029 में लोकसभा की सीटें बढ़ानी होंगी. पर उसके लिए परिसीमन विधेयक लाना होगा, यानी संविधान संशोधन करना होगा। इसके लिए 2/3 बहुमत होना आवश्यक होगा और वह 362 होता है.

महिला आरक्षण - 

परिसीमन के अंतर्गत महिला आरक्षण को भी बढ़ाकर 33% करने का प्रावधान होगा, जिससे महिलाओं की लोकसभा में संख्या बढ़ेगी. इससे देश में महिलाएं एक मजबूत शक्ति बनकर उभरेंगी. पर पिछली बार जब सरकार ने यह सब किया, तो वह विधेयक पारित नहीं हो सका क्योंकि एनडीए को 2/3 बहुमत नहीं था.



अब इसमें विवाद क्या आ रहा है - 

दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि उनकी लोकसभा की सीटें कम हो जाएंगी क्योंकि दक्षिण भारत में जनसंख्या वृद्धि दर कम है, जबकि उत्तर भारत में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है। हालांकि सरकार ने कोशिश की थी कि उन्हें कोई नुकसान न हो, लेकिन वह इसमें कामयाब नहीं हो सकी.

यानी परिसीमन का मतलब भारत में चुनावी क्षेत्रों और सीटों को नई जनसंख्या के अनुसार सही करना तथा महिलाओं के आरक्षण को लागू करने का रास्ता तैयार करना है.


क्या मानसून सत्र में लोकसभा में भाजपा यह विधेयक पारित कर सकती है-

लोकसभा में इस समय भाजपा के 293 सांसद हैं और बहुमत के लिए भाजपा को 362 या 360 का आंकड़ा हासिल करना होगा। इस हिसाब से तो नहीं लगता कि भाजपा इस विधेयक को पारित करा सकती थी, पर अब सब बदल रहा है। कल यानी 14 जून 2026 को तृणमूल कांग्रेस (TMC)) के 20 सांसदों ने एक नई पार्टी में विलय कर एनडीए को समर्थन दिया। इससे यह आंकड़ा 293 + 20 = 313 हो जाता है.

फिर भी 360 से अभी भाजपा बहुत दूर है, लेकिन यदि डीएमके भी एनडीए को समर्थन दे दे, तो उसके 22 सांसद होते हैं, जिससे यह संख्या 335 तक पहुंच जाती है. और अगर कुछ छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन लिया जाए, तो एनडीए 362 तक पहुंचकर परिसीमन विधेयक पारित करा सकता है. लेकिन इसमें एनडीए को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

यदि कुछ विपक्षी दल इस विधेयक का समर्थन कर दें या मतदान के दौरान कुछ सांसद अनुपस्थित रहें तो स्थिति बदल सकती है। इसलिए यह कहना कि यह विधेयक निश्चित रूप से पारित हो जाएगा या निश्चित रूप से पारित नहीं होगा अभी सही नहीं होगा. इसका फैसला काफी हद तक राजनीतिक सहमति और संसद में उस समय मौजूद संख्या बल पर निर्भर करेगा.


टीएमसी(TMC) के टूटने से भाजपा को फायदा-

अभी कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने 2 से 3 बार कहा कि साल के अंत तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे। उन्होंने ऐसा क्यों कहा, यह बात किसी को समझ नहीं आ रही थी क्योंकि एनडीए के पास तो बहुमत है, फिर सरकार कैसे गिर जाएगी? पर राजनीति बहुत अस्थिर होती है। अगर कोई दल समर्थन वापस ले ले, तो सरकार गिर सकती है.

यानी या तो जेडीयू या फिर दूसरे दल अगर एनडीए से अलग होते हैं, तो भाजपा 240 सीटों के साथ सरकार नहीं बना सकती क्योंकि बहुमत के लिए 282 सीटें चाहिए। पर अब टीएमसी से अलग हुए 20 सांसद भाजपा को बहुत अच्छी स्थिति में रखेंगे.

बंगाल में टीएमसी का कमजोर होना भाजपा को एक बहुत बड़े राज्य में अपने पांव फैलाने में मदद करेगा क्योंकि वाम दल तो बंगाल में पहले से ही कमजोर हैं और टीएमसी अब बिखर चुकी है। वहीं कांग्रेस तो पहले से ही पृष्ठभूमि में थी ही नहीं। इसलिए अब भाजपा अकेली बड़ी पार्टी बची है बंगाल में.

FAQ -

1. परिसीमन (Delimitation) क्या होता है?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत नई जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों की संख्या में बदलाव किया जाता है, ताकि सभी क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके.

2. परिसीमन विधेयक की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
जनसंख्या में समय के साथ बदलाव आता रहता है। ऐसे में विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की आबादी के अनुसार सीटों का पुनर्निर्धारण करने के लिए परिसीमन विधेयक की आवश्यकता पड़ती है.

3. परिसीमन को लेकर विवाद क्यों हो रहा है?

दक्षिण भारत के कई राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या वृद्धि दर कम होने के कारण उनकी लोकसभा सीटें घट सकती हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक होने से वहां सीटों की संख्या बढ़ सकती है। इसी वजह से इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है.

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