यूरोप और अमेरिका की दूरी: क्या हो रहा है?
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य गठबंधनों और बदलती भू-राजनीति ने दुनिया भर के विशेषज्ञों का ध्यान खींच लिया है। इन्हीं गठबंधनों में एक नाम बार-बार सुनने को मिलता है, इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC), जिसे कुछ लोग इस्लामिक नाटो भी कहते हैं।
आज की दुनिया में भू-राजनीति बहुत तेजी से बदल रही है, क्योंकि मध्य पूर्व में एक नया गठबंधन बन रहा है या यूँ कहें कि बन चुका है, जिसे कुछ लोग इस्लामिक नाटो भी कहते हैं।
अब मेरा मानना है कि भविष्य में यह गठबंधन भारत की विदेश नीति और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच कभी भी युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है, तो क्या पूरा इस्लामिक गठबंधन भारत के खिलाफ लड़ेगा?
अगर मीडिया और कुछ लोगों की बात सुनी जाए, तो यह भारत के लिए जरूर एक खतरा माना जाता है। लेकिन भारत इसके लिए बहुत पहले से ही तैयारी कर चुका है, क्योंकि पाकिस्तान इस गठबंधन को काफी बढ़ावा देता है।
पहले हम चरणबद्ध तरीके से इस गठबंधन के बारे में समझते हैं और फिर देखते हैं कि भारत को क्या करना चाहिए।
इस्लामिक नाटो इसका मूल नाम नहीं है। इसका सही नाम इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC) है। इस गठबंधन की शुरुआत 2015 में सऊदी अरब ने की थी और आज की तारीख तक इसके 40 से अधिक सदस्य देश हैं। हाल ही में कतर भी इसका सदस्य बना है।
अब सवाल आता है कि इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना है। इसमें सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, पाकिस्तान और तुर्की आदि देश शामिल हैं।
अगर बात करें कि क्या यह गठबंधन बिल्कुल नाटो की तरह है, तो इसका उत्तर हाँ और नहीं दोनों हो सकता है। क्योंकि यह एक सैन्य सहयोग वाला समूह है, लेकिन नाटो और इस गठबंधन की शक्तियों तथा संरचना में काफी अंतर है।
वैसे यह समूह मध्य पूर्व की प्रमुख समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जिनमें युद्ध, आतंकवाद और राजनीतिक समस्याएँ शामिल हैं। जिस तरह मध्य पूर्व में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही है, वह चिंता का विषय है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और क्षेत्र के अन्य हिस्सों में तालिबान, आईएसआईएस और अल-कायदा जैसे समूह पहले ही काफी दबाव पैदा कर चुके हैं। यदि क्षेत्रीय देश एकजुट नहीं होते, तो आशंका है कि स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है।
एक कारण यह भी हो सकता है कि सऊदी अरब मुस्लिम दुनिया में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत करना चाहता हो। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह उसकी क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा हो सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में, जब ईरान इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, सऊदी अरब भी अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना चाहता है।
दूसरा कारण यह है कि आईएसआईएस के हमलों ने दुनिया भर में भय का माहौल पैदा किया था। ऐसे में कई मुस्लिम देश यह दिखाना चाहते थे कि वे आतंकवाद के खिलाफ हैं और उससे लड़ने के लिए एकजुट हैं।
इसके अलावा, मुस्लिम देशों के बीच एकता को बढ़ावा देना, सामूहिक रूप से अपनी आवाज उठाना और स्वयं को कमजोर न दिखाना भी इस गठबंधन के पीछे के कारणों में शामिल हो सकता है।
क्या यह समूह नाटो जितना मजबूत है?
इसका उत्तर है नहीं। क्योंकि इस गठबंधन में शामिल देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित और आपसी मतभेद हैं। इनके बीच वैसी एकजुटता नहीं है जैसी नाटो में देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, तुर्की और मिस्र, कतर और सऊदी अरब, तथा पाकिस्तान और ईरान के बीच समय-समय पर विश्वास और नीतिगत मतभेद देखने को मिलते रहे हैं। यही कारण है कि इस गठबंधन को नाटो जैसी एकजुट और शक्तिशाली सैन्य संरचना नहीं माना जाता।
पाकिस्तान इस समूह में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है, क्योंकि वह लंबे समय से कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है और समय-समय पर परमाणु हथियारों से जुड़ी बयानबाजी भी करता रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि यदि यह समूह भविष्य में नाटो की तरह कार्य करने लगे, तो भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।
इसी कारण भारत को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति के स्तर पर हमेशा सतर्क रहना होगा, ताकि वह पाकिस्तान और इस प्रकार के किसी भी क्षेत्रीय गठबंधन से उत्पन्न संभावित चुनौतियों का सामना कर सके।
हालाँकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सभी मुस्लिम देशों की सोच पाकिस्तान जैसी नहीं है। उदाहरण के लिए, यूएई, सऊदी अरब और कई अन्य मध्य पूर्वी देशों के भारत के साथ अच्छे और मजबूत संबंध हैं। व्यापार, निवेश, ऊर्जा और कूटनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में भारत और इन देशों के बीच साझेदारी लगातार बढ़ रही है।
अगर अंतिम निष्कर्ष की बात करें, तो फिलहाल इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC) भारत के लिए कोई सीधा खतरा नहीं माना जाता। भविष्य में यह समूह किस प्रकार काम करता है, उसकी नीतियाँ कैसी रहती हैं और सदस्य देशों के बीच कितनी एकजुटता बनती है, उसी के आधार पर इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा।
प्रश्न 1. इस्लामिक नाटो क्या है?
उत्तर: इस्लामिक नाटो का आधिकारिक नाम इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC) है। यह एक सैन्य गठबंधन है, जिसकी शुरुआत 2015 में सऊदी अरब ने की थी। फिलहाल इसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ मिलकर कार्य करना है।
प्रश्न 2. क्या इस्लामिक नाटो और नाटो एक ही हैं?
उत्तर: नहीं, दोनों गठबंधनों का उद्देश्य अलग-अलग है। नाटो एक शक्तिशाली सामूहिक रक्षा गठबंधन है, जबकि IMCTC मुख्य रूप से आतंकवाद-रोधी सहयोग पर केंद्रित है। दोनों की सैन्य शक्ति और संरचना में काफी अंतर है।
प्रश्न 3. इस्लामिक नाटो में कितने देश शामिल हैं?
उत्तर: IMCTC में लगभग 40 से अधिक मुस्लिम-बहुल देश शामिल हैं, जिनमें पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और तुर्की जैसे देश प्रमुख हैं।
प्रश्न 4. क्या इस्लामिक नाटो भारत के लिए खतरा बन सकता है?
उत्तर: फिलहाल इस्लामिक नाटो को भारत के लिए प्रत्यक्ष सैन्य खतरा नहीं माना जाता। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार बदलती भू-राजनीति और पाकिस्तान के प्रभाव को देखते हुए भारत को रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर सतर्क रहना होगा।
प्रश्न 5. इस्लामिक नाटो में पाकिस्तान की क्या भूमिका है?
उत्तर: पाकिस्तान IMCTC का एक महत्वपूर्ण सदस्य है और वह कई बार कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। इसी कारण भारत में कुछ लोग इस गठबंधन को संभावित चुनौती के रूप में देखते हैं।
प्रश्न 6. इस्लामिक नाटो का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य आतंकवाद, उग्रवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता के खिलाफ मुस्लिम देशों के बीच सैन्य सहयोग को बढ़ावा देना है। साथ ही यह सदस्य देशों के बीच एकता और समन्वय को भी मजबूत करने का प्रयास करता है।
स्रोत: प्रिंट मीडिया।
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