यूरोप और अमेरिका की दूरी: क्या हो रहा है?
किसी भी देश का दूसरे देशों के साथ कैसा संबंध होगा, दुनिया के मुद्दों पर उसका क्या रुख रहेगा और अपने देश के हितों की रक्षा कैसे करेगा, इन सभी बातों को मिलाकर विदेश नीति (Foreign Policy) कहा जाता है। एक देश दुनिया के अन्य देशों के साथ कैसे व्यवहार करता है, वही उसकी विदेश नीति होती है।
हर देश अपनी जरूरतों और राष्ट्रीय हितों के अनुसार विदेश नीति बनाता है। इसमें देश की सुरक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल होते हैं। जैसे भारत कई देशों के साथ व्यापार समझौते करता है ताकि अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके। साथ ही सुरक्षा के लिए रक्षा साझेदारियाँ भी बनाई जाती हैं।
विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य देश के हितों की रक्षा करना और दुनिया में अपनी स्थिति को मजबूत बनाना होता है। इसके माध्यम से देश शांति बनाए रखने, युद्ध से बचने और अन्य देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश करता है।
भारत की विदेश नीति में पंचशील, गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) और नेबरहुड फर्स्ट जैसे सिद्धांत काफी महत्वपूर्ण रहे हैं। आज भारत अमेरिका, रूस, जापान और कई अन्य देशों के साथ संतुलित संबंध बनाकर चल रहा है।
विदेश नीति एक ऐसी रणनीति है जो तय करती है कि कोई देश दुनिया के सामने अपने हितों की रक्षा कैसे करेगा और दूसरे देशों के साथ संबंध कैसे बनाएगा।
अब सवाल आता है कि भारत में यह कैसे शुरू हुई। भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य देश के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और दुनिया के अन्य देशों के साथ अच्छे संबंध बनाना है। आजादी के बाद भारत ने शांति, सहयोग और गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत की विदेश नीति की नींव रखी थी। उन्होंने पंचशील और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) को बढ़ावा दिया, जिसका अर्थ था कि भारत किसी एक शक्ति गुट का हिस्सा न बने।
भारत की विदेश नीति हमेशा शांति और विकास पर जोर देती है। भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंध मजबूत करने के लिए “नेबरहुड फर्स्ट” नीति पर काम करता है। इसके अलावा भारत अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस और अन्य देशों के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी और रक्षा साझेदारी भी बढ़ा रहा है।
आज कई विशेषज्ञ भारत को भविष्य की महाशक्ति भी मानते हैं। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर भी भारत अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार भारत की विदेश नीति देश की सुरक्षा, आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय सम्मान को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
भारत की विदेश नीति की शुरुआत 15 अगस्त 1947 के बाद हुई, जब भारत ब्रिटिश शासन से आज़ाद हुआ। आज़ादी के तुरंत बाद देश को दुनिया के अन्य देशों के साथ नए संबंध बनाने की आवश्यकता पड़ी। इसी समय भारत ने अपनी अलग और स्वतंत्र विदेश नीति तैयार करनी शुरू की। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भारत की विदेश नीति का मुख्य निर्माता माना जाता है।
जवाहरलाल नेहरू ने भारत की विदेश नीति को शांति, सहयोग और गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर बनाया। उस समय दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो गुटों में बँटी हुई थी, लेकिन भारत ने किसी एक पक्ष का साथ लेने के बजाय गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) को अपनाया। इसका उद्देश्य था कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय ले सके।
भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य देश की सुरक्षा, आर्थिक विकास और दुनिया में अपनी पहचान को मजबूत बनाना था। आज भी भारत की विदेश नीति पंचशील, शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांतों पर आगे बढ़ रही है। इसी वजह से भारत दुनिया में एक मजबूत और भरोसेमंद देश के रूप में देखा जाता है।
भारत की विदेश नीति का विकास आज़ादी के बाद धीरे-धीरे हुआ। 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत को दुनिया के अन्य देशों के साथ नए संबंध बनाने पड़े। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति की नींव रखी। उन्होंने शांति, पंचशील और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) को बढ़ावा दिया।
शुरुआती दौर में भारत ने किसी बड़े शक्ति गुट का हिस्सा बनने के बजाय तटस्थ रहने की नीति अपनाई। इसके बाद समय के साथ भारत की विदेश नीति में कई बदलाव आए। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देशों के साथ व्यापार और प्रौद्योगिकी संबंध मजबूत किए।
आज भारत की विदेश नीति केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, रक्षा और वैश्विक सहयोग पर भी ध्यान केंद्रित करती है। भारत अब दुनिया में एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जाता है।
भारत के संविधान में विदेश नीति और अन्य देशों से संबंधित विषयों को केंद्रीय सूची (Union List) में रखा गया है। यूनियन लिस्ट उन विषयों की सूची होती है जिन पर केवल केंद्र सरकार कानून बना सकती है। क्योंकि विदेश नीति का संबंध पूरे देश की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंध और राष्ट्रीय हितों से होता है, इसलिए इसे राज्य सरकारों के बजाय केंद्र सरकार के अधिकार में रखा गया है।
भारत की संसद और केंद्र सरकार ही अन्य देशों के साथ समझौते, संधि, व्यापार समझौते और रक्षा साझेदारी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। संविधान की सातवीं अनुसूची में यूनियन लिस्ट के अंतर्गत रक्षा, विदेश मामले और कूटनीतिक संबंध जैसे विषय शामिल हैं।
विदेश नीति एक ऐसा महत्वपूर्ण विषय है जिसे पूरे देश के हित को ध्यान में रखकर केवल केंद्र सरकार द्वारा संभाला जाता है।
जैसे ऊपर के लेख में हमने “सूची” शब्द सुना, इसलिए संघ सूची के बारे में जानना जरूरी है।
भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची (Union List) का वर्णन किया गया है। शुरुआत में संघ सूची में 97 विषय थे, लेकिन समय के साथ कुछ संशोधन होने के बाद अब इसमें लगभग 100 विषय शामिल हैं। इन विषयों पर केवल केंद्र सरकार को कानून बनाने का अधिकार होता है।
संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे रखे गए हैं, जैसे रक्षा, विदेश नीति, रेलवे, बैंकिंग, मुद्रा, परमाणु ऊर्जा और संचार। क्योंकि ये विषय पूरे देश को प्रभावित करते हैं, इसलिए इनका नियंत्रण केंद्र सरकार के पास होता है।
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